आलेख : उसकी खता नहीं, है ये मेरा कसूर - एनके सिंहUpdated: Wed, 17 May 2017 10:10 PM (IST)

नसीमुद्दीन हों या कपिल, इन्हें अपने नेता का भ्रष्टाचार तभी क्यों दिखता है जब नेता द्वारा इन्हें हाशिए पर धकेला या पद छीन लिया जाता

कभी कोई नसीमुद्दीन सिद्दीकी अचानक एक दिन खड़ा होता है और प्रेस कांफ्रेंस करके कई सीडी जारी करता है, जिनमें बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की मुखिया और उत्तर प्रदेश की कई बार मुख्यमंत्री रहीं मायावती को पैसे के लिए गैरकानूनी रूप से दबाव डालने की बात कहते सुना गया। नसीमुद्दीन बसपा सरकार में न केवल सबसे दमदार मंत्री रहे, बल्कि दशकों तक मायावती के 'हर काम में उनका दाहिना हाथ भी रहे हैं। अब बसपा से निष्कासित नसीमुद्दीन ने मीडिया के सामने कहा कि मायावती टिकट के लिए पैसे लेती हैं और अन्य तरीकों से भी पैसे लेती हैं, जो पार्टी के खाते में नहीं दिखाया जाता। इसके बाद अगले 30 मिनट में बसपा सुप्रीमो मायावती जनता को यह बताने के लिए एक प्रेस कांफ्रेंस करती हैं कि नसीमुद्दीन लोगों की बातचीत की चुपचाप रिकॉर्डिंग करते हैं और फिर ब्लैकमेल करते हैं। उनका आगे कहना था कि इस तरह का आरोप पहले भी कार्यकर्ता लगा रहे थे लेकिन तब उन्हें विश्वास नहीं होता था। 24 घंटे में नसीमुद्दीन का अगला आरोप आता है - 'महारानी (मायावती) से बड़ा ब्लैकमेलर दुनिया में और कोई नहीं और यह धंधा मैंने उन्हीं से सीखा है"।


लब्बोलुआब यह कि एक पूर्व मंत्री और एक पूर्व मुख्यमंत्री का एक-दूसरे पर भ्रष्टाचार और अपराध का आरोप-प्रत्यारोप। इस पार्टी को कुछ हफ्ते पहले देश के सबसे बड़े प्रदेश में हुए चुनाव में लगभग 2 करोड़ लोगों ने वोट दिया था। कहना न होगा कि वर्ष 2014 के आम चुनाव में इससे दस लाख कम वोट हासिल कर अन्न्ाद्रमुक ने लोकसभा की 37 सीटें जीती थीं, लेकिन बसपा ने एक भी नहीं। एक और तथ्य गौरतलब है। वर्ष 2012 के प्रदेश चुनाव में अगर बसपा मात्र 3.13 प्रतिशत (24 लाख) और वोट पा जाती तो 3.46 लाख करोड़ रुपए के बजट वाले इस राज्य पर यही मायावती और यही नसीमुद्दीन पांच साल शासन करते। कौन किसको ब्लैकमेल करता रहा है या क्या दोनों मिलकर जनता को 'ब्लैकमेल करते रहे हैं? अगर दोनों के आरोप सच हैं तो खतरा, अगर दोनों के आरोप गलत हैं तो भी खतरा और एक सही है, दूसरा गलत तो ये दोनों पिछले 30 साल से सार्वजनिक जीवन में एक-दूसरे के साथ कैसे टिके थे?


यह सवाल किसी एक मायावती या नसीमुद्दीन का नहीं है। 'आप के सुप्रीमो, अण्णा हजारे के भ्रष्टाचार-विरोधीआंदोलन की उपज और देश की राजधानी दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर अचानक उनके सबसे वफादार मंत्री रहे कपिल मिश्रा दो करोड़ रुपए घूस लेने का आरोप लगाते हैं, यह कहते हुए कि उन्होंने अपनी आंख से देखा है। अरविंद के लोग इस आरोप के जवाब में एक प्रति-आरोप लगते हैं कि कपिल भारतीय जनता पार्टी के एजेंट हैं। क्या अरविंद का इंटेलिजेंस इतना खराब है कि एक प्रतिद्वंद्वी पार्टी का एजेंट उनके साथ वर्षों तक रहता है और उसे वह मंत्री भी बनाते हैं, लेकिन कभी यह पता नहीं चल पाता? और क्या कपिल मिश्रा मानसिक रूप से इतने पंगु हैं कि उन्हें अपने नेता के बारे में वर्षों तक पता नहीं चल पाता?


इन दोनों आरोपों में एक कॉमन फैक्टर है। दोनों ने अपने नेता पर आरोप तब लगाए, जब उन्हें नेता ने हाशिये पर ला दिया या पद छीन लिया। उत्तर प्रदेश चुनाव में हार के बाद मायावती को इस मुस्लिम नेता से वितृष्णा हुई और उन्हें मध्य प्रदेश का प्रभारी बना दिया, जहां अल्पसंख्यक राजनीति है ही नहीं और जहां पार्टी का अस्तित्व भी नाममात्र का है। कपिल को भी अरविंद केजरीवाल में (जिनकी वह दशकों से सदाचार की प्रतिमूर्ति मानकर पूजा करते थे) भ्रष्टाचार का दानव उन्हें मंत्री पद से हटाए जाने के अगले 24 घंटे बाद दिखाई दिया।


एक और मामला देखें। उत्तर प्रदेश चुनाव में जब अखिलेश ने पिता मुलायम सिंह यादव से बगावत की और कांग्रेस से हाथ मिलाया तो मुलायम ने एक सभा में कहा - 'कांग्रेस मेरा मुंह न खुलवाए, वरना कई चेहरे बेनकाब हो जाएंगे। यह बात कांग्रेस के साथ गठबंधन में रहकर मंत्री बने रहते हुए नहीं पता चली इस समाजवादी नेता को! ना ही तब जब सीबीआई उनके आय से अधिक संपत्ति मामले की जांच कर रही थी और उसने देश की सर्वोच्च अदालत में छह बार मुलायम के खिलाफ अपना रुख बदला। तब भी नहीं, जब यूपीए-1की सरकार परमाणु समझौते के खिलाफ कम्युनिस्ट पार्टियों द्वारा लाए गए अविश्वास प्रस्ताव पर लगभग गिरने जा रही थी और तब उनकी पार्टी ने समर्थन दिया क्योंकि सीबीआई संपत्ति जांच के मामले में लगभग चार्जशीट तैयार कर चुकी थी। तब भी नहीं, जब उनकी पार्टी के नेता अमर सिंह भाजपा के लोगों को पैसे देकर तोड़ने की कोशिश कर रहे थे।


अगर इन मायावतियों, नसीमुद्दीनों, मुलायमों, अरविंदों, अमरों और कपिलों की समझ इतनी खराब है कि ये अपने नेता या अनुयायियों को दशकों तक नहीं पहचान पाते और उन्हें लूटने की शक्ति देते रहते हैं तो क्या इन्हें सार्वजनिक जीवन में रहना चाहिए? मायावती को किसने हक दिया कि एक तथाकथित ब्लैकमेलर को मंत्री बनाएं या नसीमुद्दीन यदि यह जानते थे कि मायावती सत्ता में आने के बाद पैसे की उगाही करती हैं तो क्या उन पर आपराधिक मुकदमा नहीं चलना चाहिए? इन सभी ने पद पर आने के पहले संविधान में निष्ठा की शपथ ली थी। फिर अब कोई मुलायम यह क्यों कह रहा है कि मुंह खोला तो सत्ता के कई तत्कालीन चहरे बेनकाब होंगे? क्या इन सभी पर संवैधानिक शपथ को भंग करने का मुकदमा नहीं चलना चाहिए? क्या ऐसी घटनाओं से जनता का भरोसा पूरे प्रजातंत्र व संवैधानिक व्यवस्था से नहीं टूटेगा ?


समस्या इस राजनीतिक वर्ग में अनैतिकता और आपराधिकता की नहीं है। ना ही हम यह कहकर बच सकते हैं कि चूंकि राजनीति में यही वर्ग आ रहा है, लिहाजा जनता के पास विकल्प नहीं है। दरअसल जाति, संप्रदाय, रॉबिनहुड इमेज (जिसके तहत हम खूंखार अपराधी शहाबुद्दीन को चार बार इस प्रजातंत्र के मंदिर लोकसभा में अपने प्रतिनिधि के रूप में भेजते हैं इसलिए कि बड़ा अपराधी है और हमें छोटे अपराधियों से बचाएगा) ने हमारी सामूहिक विवेचना शक्ति छीन ली है। हम अगर इन कुत्सित भावनाओं से बच भी गए तो यह नहीं तलाशते कि राज्य या देश का विकास किसने किया या नहीं किया। वास्तव में विकास जन-विमर्श का कभी भी मुद्दा बन ही नहीं सका। राजनीति शास्त्र का सिद्धांत है : अल्प-शिक्षित या अर्द्धशिक्षित समाज में भावनात्मक मुद्दे तार्किक और सर्व-समाज के लिए उपादेय मुद्दों पर भारी पड़ जाते हैं। हमें इससे जल्द निकलना होगा। दरअसल कौन-सा वर्ग राजनीति में आकर हमारा भाग्य विधाता बने, यह तो हमें ही तय करना था। गालिब ने यूं ही नहीं कहा था :-

उसकी खता नहीं है ये मेरा कसूर था।


(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। ये उनके निजी विचार हैं)

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