हथिनी के लिए 200 साल बाद यहां खून के प्यासे होंगे दो राज्यों के हाथीUpdated: Thu, 02 Nov 2017 03:56 AM (IST)

यह दल लवन और बार जंगल से राजधानी के समीप पहुंचा तो वन विभाग ने इसे वापस लौटाने की कोशिश की।

मधुकर दुबे, रायपुर। करीब 200 साल पहले छत्तीसगढ़ के लवन और बार जंगल में हथिनी को हथियाने के चक्कर में ओडिशा के नारसिंह व खरियार हाथी दल में खूनी जंग हुई थी। एक बार फिर इन्हीं जंगलों में दो दलों के बीच खूनी जंग होने के आसार हैं।

एलिफेंट प्रोजेक्ट सरगुजा वृत के मुख्य संरक्षक कार्यालय सूत्रों व हाथी पर शोध कर रहे विशेषज्ञों की मानें तो अभी हाल में ही ओडिशा के हाथियों के नारसिंह दल महासमुंद की सीमा में बार-बार प्रवेश करने की कोशिश कर रहे हैं। इन दलों के पूर्वज 200 साल पूर्व भी यहां आए थे, तब भी हथिनी को लेकर दोनों दलों में कई दिनों तक खूनी जंग हुई थी, इस बार भी ऐसा ही होने की उम्मीद है।

नारसिंह दल में 17 हाथियों का समूह है। यह दल लवन और बार जंगल से राजधानी के समीप पहुंचा तो वन विभाग ने इसे वापस लौटाने की कोशिश की। खरियार दल के हाथियों की भी घुसपैठ यहां हो चुकी है।दोनों दल एक दूसरे के इलाकों में घुसपैठ करने लगे हैं, क्योंकि इनके दल की मुखिया हथनी अब दूसरे दल के मादा हाथियों से संसर्ग करने का निमंत्रण दे चुकी है।

इससे इन दलों के नर और मादा एक दूसरे से संपर्क करने की कोशिश में लगे हैं। यही कारण है कि दोनों दल दो दिशाओं से निकल तो रहे हैं लेकिन संयोगवश नहीं मिल पा रहे हैं। दोनों के नर हाथी की लड़ाई हथनी की मौजूदगी में होगी। अगर संयोग से आबादी और खेतों के पास लड़ाई हुई तो जानमाल की भारी क्षति हो जाएगी। लड़ाई के दौरान दलों के हाथी अधिक आक्रमक हो जाते हैं।

हाथी दल नामा

-हाथी प्रभावित सभी जिलों में कुल 12 हाथियों के दल हैं। रायपुर जिले में 2, महासमुंद 1, कोरबा 3, धरमजयगढ़ 3, सरगुजा 5 हाथी के दल है। इन दलों में 313 हाथी हैं। इसमें रायपुर में 24, सरगुजा में 148 व बिलासपुर वन वृत्त में 141 हाथी हैं।

- नारसिंह दल में 17, खरियार दल 7,चट्टानी दल व सुंदरगढ़ दल में 36 उग्र हैं। शांत दल में बाकी दल, गुरुघासी दल, अशोक दल में कुल 45 हाथी, बुद्घ दल, धरम दल, कुदमुरा दल, छाता दल में 85, अपना दल एवं सहज दल 23, बहरादेव हैं।

राज की बात

हाथी जीव विशेषज्ञ नितिन सिंघवी के अनुसार हाथी 16 किलोमीटर की दूरी तक आपस में माइग्रेट से बातचीत करने में सक्षम हैं। इनकी लड़ाई सिर्फ मादा हाथियों से होती है, वह भी हथनी से संसर्ग के लिए।

सही बात है, इनके दल की याददाश्त बेहद मजबूत होती है। इनकी लड़ाई तभी होती है जब, इनके दल का कोई मादा हथिनी के बाद मुखिया बनना चाहता है। तब भी लड़ाई होती है। - केके बिसेन, मुख्य वन संरक्षक, सरगुजा वृत, एलिफेंट प्रोजेक्ट

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