घर तोड़ने की होड़ और कलह का बीज बोने का मंचनUpdated: Sun, 13 Sep 2015 11:41 PM (IST)

'पत्नी को पैर की जूती समझो'....यही नुस्खा मैं तुम्हारी मामी पर आजमाता था। 'क्या कहा? मैं तुम्हारी पत्नी हूं, गुलाम नहीं, जो मेरी खुशियों पर पति होने के नाते बंदिशें थोप रहे हो।' 'अले मामाजी,

रायपुर। 'पत्नी को पैर की जूती समझो'....यही नुस्खा मैं तुम्हारी मामी पर आजमाता था। 'क्या कहा? मैं तुम्हारी पत्नी हूं, गुलाम नहीं, जो मेरी खुशियों पर पति होने के नाते बंदिशें थोप रहे हो।' 'अले मामाजी, मेली शादी कब कराओगे'....जैसे रोचक संवादों से अनुकृति रंगमंडल कानपुर के कलाकारों ने रविवार को भी संस्कृति विभाग के आयोजन में 'पति, पत्नी और' ...के बीच घर के सदस्यों ने ही कलह का बीज बो दिया। देवर राकेश और भाभी लक्ष्मी में एक-दूसरे को नीचा दिखाने की ऐसी होड़ लगी कि सुनीता की गृहस्थी में आग लग गई। उनके जीवन में कलह के रूप में जीवन और मिस पीटर जैसे किरदार भी आए। इसे दर्शकों ने करतल ध्वनि से सराहा। पात्रों के संवाद में घरेलू नोकझोंक ने हर किसी को गुदगुदाया।

मुक्ताकाश मंच पर रंगमंडल के कलाकारों ने यह दिखाने का प्रयास किया कि पति-पत्नी के बीच दरार पैदा करने कोई पर पुरुष या स्त्री हो, ऐसा नहीं, परिवार का ही कोई सदस्य रिश्ते में कलह का बीज बो सकता है। प्रस्तुत नाटक की कहानी ने भी दर्शकों के बीच कुछ ऐसी ही छाप छोड़ी। इसमें मध्यम वर्गीय परिवार के दो भाइयों को मामा निहालचंद ने नारी शोषण की सीख दी। इससे गिरधर की पत्नी लक्ष्मी ने नारी हठ और प्रपंच का ताना-बाना बुना। उसने पति को गुलाम बनाने की परिपाटी का प्रतिनिधित्व किया। इतना ही नहीं, उसने देवरानी सुनीता को ऐसा पाठ पढ़ाया कि देवर राकेश की गृहस्थी में कलह की नौबत आई। इसकी वजह बनकर जहां सुनीता का कथित प्रेमी जीवन आया तो वहीं दूसरी तरफ राकेश की पूर्व प्रेमिका का किरदार निभा रही मिस पीटर ने भी अपनी अदाकारी की छाप छोड़ी। वहीं घर तोड़ने को लेकर मामा एवं लक्ष्मी में लगी होड़ के बीच मामा को नारी हठ के सामने हारकर घर छोड़ना पड़ा। नाटक में मंदबुद्धि ज्ञानचंद के लटके-झटके और तोतले संवाद ने कथानक को रोचक बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। पति, पत्नी और...का सुखद अंत ज्ञानचंद की शादी से हुआ और रंगकर्मी सुभाष मिश्रा ने शानदार प्रस्तुति के लिए कलाकारों को साधुवाद दिया।

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