25 सालों से चित्रा बना रहीं मंत्र लिखे यंत्र, 700 बना चुकींUpdated: Sun, 16 Jul 2017 12:21 AM (IST)

हिन्दू, जैन, सिक्ख, मुस्लिम धर्म के विलुप्त हो रहे यंत्रों को बचाने में लगी

रायपुर। सभी धर्मों में मंत्र लिखे हुए यंत्रों की पूजा-अर्चना करने और उसे घर, दुकान में स्थापित करने का विधान है। हाथों से लिखे हुए मंत्र वाले यंत्र विलुप्त हो रहे हैं और बाजार में रेडीमेड यंत्र बहुतायत में बिकने लगे हैं।

हाथों से बने यंत्र को विलुप्त होने से बचाने के लिए देवास (इंदौर) निवासी चित्रा जैन पिछले 25 बरसों से मंत्र-यंत्र बनाने में जुटी हैं। वे चाहती हैं कि इस कला को नई पीढ़ी के बच्चे भी सीखें जिससे धर्म के प्रति आस्था बनी रहेगी।

मंत्र-यंत्र किस प्रकार बनाया जाए, इसका प्रशिक्षण वे देशभर में घूम-घूमकर नि:शुल्क दे रही हैं। इन दिनों वे राजधानी में चातुर्मास कर रहे जैन मुनि रमेश कुमार का दर्शन व आशीर्वाद लेने पहुंची हैं। वे बच्चों को मंत्र-यंत्र बनाना सिखा रहीं हैं।

बनाते वक्त रखती हैं निर्जला उपवास

चित्रा जैन ने बताया कि 25 सालों में उन्होंने हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख व जैन धर्म के मंत्रों पर आधारित 700 यंत्र बना चुकी हैं। यंत्रों को बनाना आसान नहीं है। साधना, तपस्या करके मंत्रों को जानना आवश्यक है। एक मंत्र-यंत्र बनाने में कई दिन लगते हैं और जब यंत्र बनाती हैं तो उन दिनों निर्जला उपवास रखकर साधना करती हैं।

600 साधु-साध्वियों से ग्रहण किया

देशभर में 600 साधु-साध्वियों से मिलकर हस्तलिखित यंत्र प्राप्त किए और उन्हें बनाने के लिए साधना की। मंत्र बनाते बनाते उन्हें 4500 से ज्यादा मंत्र कंठस्थ हो चुके हैं।

बंद आंखों से देखने की कला का ज्ञान

देवास से राजधानी पहुंचीं चित्रा जैन ने आंखों पर पट्टी बांधकर कागज में लिखी हुई बातों को उसी तरह पढ़कर दिखाया जैसे खुली आंखों से पढ़ा जाता है। उन्होंने बताया कि इसके ज्ञान के लिए विशेष साधना करनी पड़ती है। राजधानी के बच्चों को भी यह साधना करना सिखाएंगी।

मंत्र-यंत्र विद्या एक तकनीकी कर्म - मुनि रमेश कुमार

मुनि रमेश कुमार ने यंत्रों की महत्ता बताते हुए कहा कि मंत्र -यंत्र विद्या एक तकनीकी कर्म है। इस विद्या में निष्णात होने के लिए तप जप और साधना करनी होती है। जिस समय साधना करते हैं, उस वक्त साधक के कण-कण में रोम-रोम में वह मंत्र गूंजता रहता है। विधि मंत्र यंत्र का निरंतर व नियमित अभ्यास करने पर वह फल प्रदान करता है। इस साधना के मूल में श्रद्धा है। श्रद्धा के बिना सिद्धि संभव नहीं है। शब्द में शक्ति होती है, किसी भी शब्द को लंबे समय तक पुनरावृत्ति करने से ध्वनि तरंगों का निर्माण होता है। वे तरंगें हमारे आभामंडल का निर्माण करती हैं, जिससे साधक तेजस्वी बनता है। यंत्र को उसी रूप में लिखा जाता है।

अटपटी-चटपटी

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