महुआ का बीज भी खरीदा जाएगा समर्थन मूल्य मेंUpdated: Wed, 15 Mar 2017 08:07 AM (IST)

राज्य शासन ने वर्ष 2017 वनोपज संग्रहण के लिए समर्थन मूल्य निर्धारित कर दिया है।

कोरबा। राज्य शासन ने वर्ष 2017 वनोपज संग्रहण के लिए समर्थन मूल्य निर्धारित कर दिया है। समर्थन मूल्य वाले वनोपज में पहली बार महुआ बीज को भी शामिल किया गया है। 20 रुपए प्रति किलो की दर से वनोपज संग्राहक वनसमितियों में विक्रय कर सकेंगे। समर्थन मूल्य के अनुसार इस वर्ष कुसमी लाख की कीमत में 170 व चारपᆬल में 20 रुपए की कमी आई है।

वन क्षेत्र से आच्छादित जिले के 40 फीसदी लोग वनोपज संग्रहित कर जीविकोपार्जन करते हैं। प्रति वर्ष संग्रहित किए जाने वाले वनोपज की मूल्य में नियंत्रण रखने के लिए शासन की ओर समर्थन मूल्य की घोषणा की जाती है। इस वर्ष जारी समर्थन मूल्य में लाख में भारी परवर्तन आया है। वहीं महुआ बीज को समर्थन मूल्य में लिए जाने का निर्णय लिया गया। महुआ बीज का समर्थन मूल्य नहीं होने कारण बिचौलिए संग्राहकों से औने-पौने दाम पर खरीदी कर लेते थे। जो लाभ संग्राहकों को मिलना चाहिए उससे अधिक लाभ बिचौलिए ले रहे थे।

महुआ बीज को डोरी के नाम से जाना जाता है, जिसका तेल कई तरह के उपयोग में लाया जाता है। कुसमी लाख जो बीते वर्ष 320 रुपए व चारफल 80 रुपए में खरीदा गया, उक्त दोनों ही वनोपज में क्रमशः 170 व 20 रुपए कमी की गई है। इस वर्ष जो समर्थन मूल्य घोषित किया गया है, उसमें लाख 150 रुपए व चारफल 60 रुपए में खरीदा जाएगा। मूल्य कम करने के पीछे विभाग की यह मंशा है कि कम कीमत में संग्राहकों से चार लाख को खरीद कर अधिक कीमत में खपाया जा रहा है। समर्थन मूल्य कम होने से हो प्रतिस्पर्धा की स्थिति निर्मित होगी इससे आम संग्राहकों को वनोपज का अधिक से अधिक लाभ मिल सकेगा।

इमली उपज में इजाफा

बीते वर्ष की अपेक्षा इमली की उपज में इजाफा का आसार नजर आ रहा है। इमली एकमात्र ऐसा वनोपज है जो वनक्षेत्र की अपेक्षा आसपास के परिवेश में उत्पादित किया जाता है। बेहतर फसल होने के बावजूद इमली का समर्थन मूल्य 18 रुपए ही रखा गया है। अन्य उपज की अपेक्षा सामान्य बाजार में इमली की मांग अधिक होती है। कीमत यथावत रखे जाने इसका किसानों को बेहतर लाभ मिल सकेगा।

समय से पहले संग्रहण

संग्राहकों के आपस में संगठित नहीं होने के कारण लाख चार जैसे कीमती वनोपज को तैयार होने से पहले ही तोड़ दिया जाता है। वन विभाग के संरक्षण में समिति का गठन नहीं किए जाने के कारण इस तरह की स्थिति निर्मित हो रही है। चारफल में चिरौंजी आने से पहले ही तोड़े जाने के कारण इसका अपेक्षित लाभ संग्राहकों को नहीं मिल पा रहा है। वन विभाग की निष्क्रियता के चलते समितियों में भी बिचौलियों की पैठ देखी जा रही है।

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