तब स्वतंत्रता के लिए लड़े, अब मानवता के लिए देह समर्पित कर गए दत्तात्रेयUpdated: Fri, 11 Aug 2017 04:03 AM (IST)

जीवनभर समाजिक दायित्वों को आगे रखने वाले श्री माहुलीकर ने अपने उसूलों से कभी मुंह न मोड़ा और हर कदम पर मानव मात्र की सेवा के लिए दौड़ते रहे।

कोरबा। दत्तात्रेय श्रीराम माहुलिकर, यह वो नाम है, जिन्होंने मीसा बंदी के रूप में तब आवाज बुलंद की थी, जब देश का लोकतंत्र संकट में था। जीवनभर समाजिक दायित्वों को आगे रखने वाले श्री माहुलीकर ने अपने उसूलों से कभी मुंह न मोड़ा और हर कदम पर मानव मात्र की सेवा के लिए दौड़ते रहे।

जीवन में अंतिम क्षणों में भी उन्होंने अपनी सेवाभावी भूमिका को थामे रखा और मेडिकल की पढ़ाई में योगदान देने देहदान की इच्छा जाहिर की। गुरूवार की शाम उनकी धड़कनों को विश्राम मिला और यह संकल्प पूरा करने शुक्रवार को उनका पार्थिव शरीर छत्तीसगढ़ आयुर्विज्ञान संस्थान (सिम्स) बिलासपुर के सुपुर्द कर दिया जाएगा।

बिजली कंपनी से सेवानिवृत्त व स्याहीमुड़ी के प्रतिष्ठित नागरिक दत्तात्रेय श्रीराम माहुलीकर का 86 वर्ष की आयु में गुरूवार की शाम 6.30 बजे देहांत हो गया। स्याहीमुड़ी स्थित उनके निवास पर अचानक तबियत बिगड़ने की वजह से उन्हें एचटीपीएस विभागीय अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहां उन्होंने अंतिम सांसें ली।

उन्होंने वर्ष 2016 में स्वयंप्रेरित होकर देहदान की इच्छा जताई। संकल्प के अनुरूप 84 वर्ष की आयु में उन्होंने सिम्स में देहदान का घोषणा पत्र भरा, जिसमें लिखा था कि मृत्यु उपरांत उनकी देह अध्ययन-अध्यापन के उपयोग के लिए शरीर रचना विभाग, सिम्स को दान कर दी जाए।

शिक्षक विवेक लांडे व विनीत कुमार निर्मलकर उनके संकल्प के साक्षी बने। मृत्यु के बाद उनके पुत्र व शासकीय हायर सेकेंडरी स्कूल स्याहीमुड़ी के शिक्षक हेमंत माहुलीकर की जिम्मेदारी होगी कि शरीर रचना विभाग सिम्स को सूचित करे। उनके संकल्प व अंतिम इच्छा का पालन करते हुए शुक्रवार को उनकी देह सिम्स बिलासपुर को सौंप दी जाएगी।

मेडिकल की पढ़ाई में साइलेंट टीचर

मेडिकल की प्रायोगिक पढ़ाई के लिए मानव देह काफी अहम है। मेडिकल की पढ़ाई में साइलेंट टीचर यानि मूक शिक्षक कही जाने वाली देह अहम भूमिका रखती है। मेडिकल स्टूडेंट की पढ़ाई पहले दिन ही मृत देह से शुरू हो जाती है।

करीब दस मेडिकल स्टूडेंट को एक बॉडी मिलती है, जिससे वह शरीर की रचना के बारे में सीखते व जानते हैं। मेडिकल स्टूडेंट को डेढ़ साल तक शरीर रचना के बारे में मृत देह से पढ़ाई करनी होती है। इस मृत देह पर काम करके ही डॉक्टर को किसी घायल या बीमार मरीज के शरीर पर चाकू, कैंसी या अन्य मेडिकल इक्युपमेंट चलाने का भरोसा, कुशलता व साहस मिल पाता है।

पिता के साहसिक निर्णय पर गर्व

पुत्र हेमंत माहुलीकर व पुत्री श्रीमती संध्या देवले ने कहा कि उनके पिता का यह निर्णय उन्हीं की तरह महान है, जो मानव मात्र की भलाई के लिए है। देहदान के लिए सरकारी नियम-कानून भी काफी जटिल हैं, जिनसे गुजकर संकल्प पूरा करना भी एक तेढ़ी खीर है।

इसके अलावा सामाजिक बाध्यताएं तोड़कर और धार्मिक मान्यताओं से ऊपर उठकर देहदान के संकल्प का निर्णय एक चुनौतिभरा कदम है। जब कोई देहदान करता है तो उसकी मृत्यु के बाद उस कठिन घड़ी में मृत देह को समय रहते सुरक्षित पहुंचाने के नियमों के पालन में परिजनों के समक्ष एक कठिन स्थिति भी होती है, जिसे सहन करना गर्व के साथ एक साहसिक पल भी होता है।

अंतिम दर्शन आज सुबह 9 बजे

शुक्रवार को सुबह 9 बजे से 9.30 बजे तक निवास स्थल परिमल, स्याहीमुड़ी में उनकी देह अंतिम दर्शनों के लिए रखी जाएगी। इसके बाद देह सिम्स बिलासपुर के लिए भेज दी जाएगी। 30 नवंबर 1989 को सेवानिवृत्त हुए स्वर्गीय माहुलीकर स्वयंसेवक संघ के सक्रिय कार्यकर्ता रहे।

वे बिजली मजदूर संघ व विद्या भारती सरस्वती शिशु मंदिर कोरबा पश्चिम के संस्थापक सदस्य भी रहे। देश में आपातकाल के समय उन्होंने लोकतंत्र सेनानी (मीसा बंदी) की भूमिका निभाते हुए सरकार के खिलाफ आवाज उठाई और जेल भी गए।

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