सुपारी का विकल्प बना छिंद गुठली, गुटखा में हो रहा उपयोगUpdated: Mon, 15 May 2017 12:48 AM (IST)

कंपनी वालों ने इसका बेहतर विकल्प खोज लिया है। वे सुपारी की जगह छिंद गुठली का उपयोग करने लगे हैं।

जगदलपुर। बस्तर का खजूर के नाम से चर्चित छिंदफल की गुठली की निकासी प्रदेश से बाहर हो रही है। इसका उपयोग सुपारी का विकल्प के रूप में गुटका में हो रहा है। बिना टीपी बनवाए इसकी निकासी बिलासपुर- भिलाई के अलावा गोन्दिया, नागपुर तक की जा रही है।

बस्तर में छिंद की अधिकता है इसलिए इसे बस्तर का खजूर कहते हैं। बहुलता के कारण ही कुछ गांवों का नाम छिंद आधारित -छिंदबहार, छिंदनार, छिंदावाड़ा, छिंदगूर आदि है। बताया गया कि बस्तर में दो प्रकार का छिंद है।

बड़े छिंद के पत्ते का उपयोग झाड़ू, चटाई ,टोकरियां बनाने में होता है वहीं काष्ठ का उपयोग घर बनाने में किया जाता है। इसके फल को बेच कर ग्रामीण अतिरिक्त आय प्राप्त करते हैं, जबकि बूटा छिंद की पत्तियों का उपयोग झोपड़ियों की छत संवारने में होता आया है।

पहले छिंदफल हाट बाजारों तक सिमित था और लोग मौसमी फल के रूप में इसे खाते रहे हैं लेकिन अब इसे खरीदने व्यापारी स्वयं बाजार तक आने लगे हैं। बताया कि 10 रूपए पायली की दर से खरीदा जा रही छिंद गुठली 'फल' के नाम से प्रदेश के रायपुर, भिलाई, राजनांदगांव ,बिलासपुर के अलावा गोन्दिया, अमरावती, नागपूर तक जा रहा है।

कोड़ेनार ,बास्तानार, किलेपाल आदि साप्ताहिक बाजार में ग्रामीणों से छिंदफल खरीदने वाले जगदलपुर के व्यापारी असगर खान ने बताया कि बाजार में सुपारी की कीमत थोक में ही 315 रुपए से लेकर 440 रुपए तक है जबकि कटह सुपारी की कीमत 360 रूपए है, इसलिए गुटका में सुपारी का उपयोग महंगा पड़ता है। कंपनी वालों ने इसका बेहतर विकल्प खोज लिया है। वे सुपारी की जगह छिंद गुठली का उपयोग करने लगे हैं।

बताया गया कि संभाग के सातों जिले से पिछले पांच साल से छिंद गुठली की निकासी जारी है।इसे महज फल बताकर बाहर पहुंचाया जा रहा है। यह भी बताया गया कि प्रतिवर्ष करीब 10 टन गुठली बाहर जा रही है।

इधर वनोषधि व्यवसाय से जुड़े रहे अरूण चौबे ने बताया कि छिंद गुठली की तरह निर्मली बीज का उपयोग भी गुटका व्यवसाय में हो रहा है। छिंदगुठली को नुकसानदेह नहीं माना जाता लेकिन निर्मली विषाक्त होता है। इधर वन अधिकारियों का कहना है कि बस्तर से छिंदफल के बाहर जाने की कोई खबर उन्हे नहीं है।

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