बस्तर के वनांचल में अब नहीं गूंजती ढेंकीUpdated: Mon, 09 Oct 2017 01:22 AM (IST)

ग्रामीण भी मजाक के लहजे में कहते हैं कि एक रूपया वाले चावल ने ढेंकी को बेरोजगार कर दिया।

जगदलपुर । प्रदेश के मैदानी इलाकों में ढेंकी से अनाज कूटने का परंपरा तो बहुत पहले खत्म हो चुकी है। वहीं सस्ता चावल मिलने के कारण अब वनांचल में भी ढेंकी से धान कूटने की आवाज सुनाई नहीं पड़ती। ग्रामीण भी मजाक के लहजे में कहते हैं कि एक रूपया वाले चावल ने ढेंकी को बेरोजगार कर दिया।

बस्तर के वनांचल में अभी भी 15- 20 किमी के दायरे में हॉलर मिल तो दूर किराना दुकान भी नहीं है, इसलिए ग्रामीणों को समीपस्थ कस्बा या नगरों में आकर धान कुटवाना पड़ता है, रोज कमाने -खाने वाले ग्रामीण पकाने- खाने के लिए वे ढेंकी में ही धान कूट कर चावल प्राप्त करते रहे हैं लेकिन अब यह काम भी लगभग बंद हो गया है।

हल्बा समाज के संभागीय अध्यक्ष अर्जुन नाग बताते हैं कि जब से ग्रामीणों को सस्ता चावल मिलने लगा है, ग्रामीण ढेंकी का उपयोग लगभग बंद कर चुके हैं। पहले धान, कोदो, मड़िया, कोसरा आदि कूटकर छिलका निकालने का काम ढेंकी से होता था।

अब एक रूपए की दर से महीना भर के लिए चावल मिल जाता है, इसलिए ग्रामीण महिलाएं भी ढेंकी से चावल कूटने का काम छोड़ चुकी हैं, वहीं कोदो- कुटकी जैसे मोटे अनाज का दिलका निकलवानें के लिए वे 15-20 किमी दूर के मिलों में चली जाती हैं चूंकि अब वाहनों की पहुंच गांवों तक हो गई है।

वन प्रबंधन समिति माचकोट के अध्यक्ष मानिकराम बताते हैं कि आदर्श ग्राम माचकोट को देखने आने वाले सैलानी बस्ती में महिलाओं को ढेंकी में धान कूटते देख आश्चर्य करते हैं चूंकि वे ढेंकी का नाम तो सुने थे परन्तु कभी देखे नहीं थे। सुविधाएं मिलने से अब माचकोट में भी ढेंकी का प्रचलन समाप्ति की ओर है।

संबंधित खबरें

जरूर पढ़ें

FOLLOW US

Copyright © Naidunia.