उम्र से ज्यादा बस्ते का बोझ, उठाने को मजबूर मासूमUpdated: Sat, 15 Jul 2017 11:43 AM (IST)

दूसरी क्लास तक पहुंचते-पहुंचते यह बढ़कर 5 किलो हो जाता है। पांचवी में स्कूल बैग का वजन 7 से 8 किलो तक हो जाता है।

धमतरी । स्कूली बच्चों के बस्ते का बोझ कम होने की बजाय लगातार बढ़ते ही जा रहा है। यह बात निजी शिक्षण संस्थाओं में स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। अपने उम्र की तुलना में कई गुना भारी-भरकम बस्ता उठाकर बच्चे स्कूल आने और जाने को विवश हैं। प्राइवेट स्कूल के नियम कायदे के फेर में पड़कर बच्चे और पालक पिस रहे हैं।

शिक्षा के निजीकरण के इस दौर में बस्ते का बोझ हल्का करने की हर कवायद फेल हो रही है। यूकेजी से लेकर हायर सेकण्डरी तक की कक्षाओं के बच्चे भारी बस्ता उठाने मजबूर हैं। छोटे-छोटे बच्चों के बड़े-बड़े भारी बस्तों ने हर किसी को सोचने पर मजबूर कर दिया है।

पढ़ाई के लिए इतना जरूरी क्या है कि बच्चे बैग ही न उठा पाए। बच्चों की इस तकलीफ को पालक भी महसूस करते हैं। नए शिक्षण सत्र के शुरू होने के साथ ही पालक इस तरह की शिकायतें लेकर स्कूल पहुंचने लगे हैं।

पालकों की माने तो बच्चों के बैग का वजन एक से दो किलो तक बढ़ गया है। धमतरी जिले में शासकीय 880 प्राथमिक स्कूल, निजी प्राथमिक 76 स्कूल, शासकीय मिडिल स्कूल 445, निजी 67, शासकीय हाई स्कूल 51, निजी 16 तथा शासकीय हायर सेकेण्डरी 107 व निजी 33 स्कूल स्कूल संचालित हैं।

हर साल बस्ते के वजन को कम करने के लिए जिला शिक्षा विभाग द्वारा निर्देश जारी किया जाता है। बाकायदा जिला स्तर पर गठित टीम द्वारा निरीक्षण भी किया जाता है। पर कुछ ही दिनों में यह अभियान ठप पड़ जाता है।

बस्ते के बढ़ते वजन की जांच के लिए जिला शिक्षा विभाग द्वारा टीम का गठन किया गया है पर टीम कभी फील्ड में जाती ही नहीं है। यही वजह है कि प्राइवेट स्कूल मनमानी कर रहे हैं।

हर साल बढ़ता ही जा रहा है बोझ

वर्तमान में स्कूल बैग का बढ़ता बोझ निरंतर चिंता का विषय बना हुआ है। भारी बैग की वजह से बच्चों के कंधे पर जरूरत से अधिक दबाव पड़ता है। जिससे रीढ़ की हड्डी पर भी दबाव बढ़ने लगा है। पालकों के अनुसार यूकेजी के बच्चों के बैग का वजन 3.5 किलो तक होता है। जबकि दूसरी क्लास तक पहुंचते-पहुंचते यह बढ़कर 5 किलो हो जाता है। पांचवी में स्कूल बैग का वजन 7 से 8 किलो तक हो जाता है।

स्कूल वाले कर रहे बच्चों का शोषण

पालक आकाश साहू ने कहा कि प्राइवेट स्कूल संचालक बच्चों का शोषण कर रहे हैं। कमाई के चक्कर में बैग लगातार भारी होता जा रहा है। हर साल कॉपी, किताबों की संख्या बढ़ते ही जा रही है। बच्चों की सेहत को देखते हुए इस पर लगाम लगनी चाहिए।

कोमल नामदेव ने कहा कि बच्चों के बैग जरूरत से ज्यादा भारी हैं। ऐसे में मजबूरन बच्चों की स्कूल बस तक इसे ले जाते हैं। बैग उठाने पर वास्तव में यह भारी महसूस होता है।

देवेन्द्र चंद्राकर ने कहा कि मैं बच्चे को स्कूल ड्राप करने जाता हूं। बैग भारी होने के कारण बच्चे की क्लास तक बैग पहुंचाना पड़ता है। भारी बैग की शिकायत को कोई गंभीरता से नहीं लेता। इस ओर ध्यान देने की आवश्यकता है।

सरकारी स्कूल का बस्ता हल्का

सरकारी स्कूल वालों बच्चों के बस्ते निजी स्कूल वालों के बस्ते से हल्के हैं। सरकारी स्कूलों में प्रारंभिक कक्षाओं में भाषा, गणित के अतिरिक्त एक या दो पुस्तकें हैं। लेकिन निजी स्कूलों के बस्तों का भार बढ़ता ही जा रहा है। बच्चों की शिक्षण सामग्री में वृद्धि के पीछे व्यावसायिक दृष्टिकोण ही नजर आता है।

- अगर बच्चे के स्कूल बैग का वजन बच्चे के वजन से 10 प्रतिशत से अधिक होता है तो काइफोसिस होने की आशंका बढ़ जाती है। इससे सांस लेने की क्षमता प्रभावित होती है। भारी बैग के कंधे पर टांगने वाली पट्टी अगर पतली है तो कंधों की नसों पर असर पड़ता है। कंधे धीरे-धीरे क्षतिग्रस्त होते हैं और उनमें हर समय दर्द बना रहता है। हड्डी के जोड़ पर असर पड़ता है। - डॉ. राकेश सोनी, हड्डी रोग विशेषज्ञ, जिला अस्पताल

- बस्ते का बोझ का वजन जांचने के लिए जिला स्तर पर टीम गठित है। समयसमय पर टीम द्वारा निरीक्षण किया जाता है। जांचकर कार्रवाई की जाएगी - एके देवांगन, सहायक संचालक - शिक्षा विभाग

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