नोट प्रबंधन पर खड़े होने लगे सवालUpdated: Thu, 08 Dec 2016 10:34 PM (IST)

बड़े सुधारवादी कदमों की राह आसान तो कभी नहीं होती लेकिन नोटबंदी के 30 दिन बाद यह स्पष्ट हो गया है यह मुश्किल है।

नई दिल्ली। बड़े सुधारवादी कदमों की राह आसान तो कभी नहीं होती लेकिन नोटबंदी के 30 दिन बाद यह स्पष्ट हो गया है यह बहुत मुश्किल होती है। नोटबंदी के परिणामों को फिलहाल छोड़कर केवल क्रियान्वयन पर भी चर्चा करें तो यह दिख रहा है कि सरकार और आरबीआई से लेकर दूसरी संबंधित एजेंसियों की सांसें फूलने लगी हैं। प्रबंधन की पोल पूरी तरह से खुल चुकी है।

अब भी नोटों की आपूर्ति सुस्त : नोटबंदी की पूरी सफलता इस बात पर निर्भर थी कि रिजर्व बैंक बाजार में नए नोट कितनी मुस्तैदी से भेज पा रहा है। आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेल का कहना है कि आठ नवंबर से छह दिसंबर के बीच बाजार में चार लाख करोड़ रुपए के नए नोट जारी किए गए हैं।

लेकिन जरूरत के मुताबिक ये बेहद कम हैं क्योंकि बाजार से 14.5 लाख करोड़ रुपए के 500 व 1000 के नोटों को प्रचलन से बाहर किया गया है। रिजर्व बैंक और सरकार के सभी नोट छापने वाले प्रेस तीन शिफ्टों में काम कर रहे हैं, लेकिन नोटों की किल्लत बदस्तूर जारी है। जिन बैंकों को एक हफ्ते में 60-70 लाख रुपए नकदी की जरूरत होती थी, उन्हें 5-6 लाख रुपए की आपूर्ति नकदी चेस्टों से की जा रही है।

यही वजह है कि सरकार की घोषणा के बावजूद विरले ही किसी व्यक्ति को सप्ताह में 24 हजार रुपए निकालने का मौका मिला हो। बाजार में अगले हफ्ते से 100 रुपये और 50 रुपए के नए नोट भी आने शुरू हो जाएंगे। दरअसल, सारी तरकीबों के बावजूद देश में रोजाना 50 करोड़ नोट ही छापे जा सकते हैं। ऐसे में सरकार को यह सुझाव भी दिया जा रहा है कि वह बाहर से नोट आयात करे।

कैशलेस एटीएम : नोटबंदी के बाद के एक हफ्ते तक देश के करीब 95 फीसद एटीएम बंद रहे। वजह यह थी कि एटीएम 500 व 2000 रुपए के नए नोटों को निकालने के लिए बने ही नहीं थे। देश में दो लाख के करीब एटीएम हैं और ताजा आंकड़े बताते हैं कि इनमें से 1.70 लाख एटीएम रिकैलीब्रेट हो चुके हैं। लेकिन अब भी 30 फीसद से ज्यादा एटीएम नहीं खोले जा सके हैं। ये एटीएम नए नोट निकालने के लिए तैयार हैं लेकिन नए नोटों की कमी है। ग्रामीण क्षेत्रों में तो पांच फीसद एटीएम भी अब तक चालू नहीं हो पाए हैं।

बैंकों की नजर खास ग्राहक पर : पिछले कुछ दिनों में मिल रही रिपोर्ट बताती है कि अधिकतर बैंक अब इस कवायद में जुट गए हैं कि पहले खास ग्राहकों को नए नोटों की आपूर्ति हो जाए। दरअसल, वे नहीं चाहते हैं कि उनके पुराने और बड़े ग्राहक व पुलिस अधिकारी नाराज हों। लिहाजा, बाहर लगी लंबी लाइन को नजरअंदाज कर केवल ऐसे ग्राहकों को ही हर सप्ताह अधिकतम 24 हजार रुपए निकासी की सुविधा दी जा रही है। यह सरकार की मंशा के विपरीत है।

सुस्त अधिकारी : सरकार का दावा है कि काले धन के कारोबारी अब बच नहीं पाएंगे लेकिन पिछले एक महीने में महज दो हजार करोड़ रुपए के काले धन के मामले सामने आए हैं। बताते हैं कि आयकर विभाग उसमें भी सुस्ती कर रहा है। सरकारी अधिकारियों की यह शिथिलता सरकार के लिए परेशानी का सबब बन सकती है क्योंकि इस पूरी प्रक्रिया के बाद आम जनता यह जानना चाहेगी कि आखिरकार कितना काला धन व्यवस्था से बाहर हुआ।

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